Sunday, August 14, 2016

            15 अगस्त 2016
आज 70वा स्वाधीनता दिवस मनाया जा रहा है .इन वर्सो में क्या खोया और क्या पाया इस का लेखा जोखा लेना चाहिए अन्यथा फूला हुआ गुबारा कितना भी सुन्दर लगता हो ,छेद होने पर एक पिचका हुआ रबर का टुकरा मात्र रह जाता है
    विकास के आंकड़े महज एक कागजी कसरत है 15 अगस्त 1947के सता हस्तांतरणके बाद भारत में आबादी बढ़ी है धनाड्य वर्ग भी बढ़ा है देश में गरीबी भुकमरी ,बेरोजगारी चरम सीमा की तरफ बढ़ रही है देस की राज सता पूर्णतया बहुरास्ट्रीय व् अन्त्रास्त्रिय आर्थिक लुटरो के लिए है भ्रष्टाचार इस व्यवस्था का सुविधा शुल्क है .जनता को बाटने के लिए जातिवाद,धर्म,सम्प्रदाय,साम्प्रदायिकता क्षेत्र्यता उच्च स्तर की तरफ बढ़ रही है ,अपराधी समाज को अनुसासन का पाठ पढ़ा रहे है भारतीय संस्क्रती का ठेका. मानसिक,आर्थिक व् लंपटो ने ले लिया है.वर्तमान शीक्सा का वास्तविक हालातो से कोई सम्बन्ध ही नहीं है .  न्यायाधीस भर्स्ट पुजारियों से आशीर्वाद लेते फिर रहे है .जबकि आशीर्वाद एक अस्तित्वहीन शब्द है .

       हम विनास की तरफ बढ़ रहे है अभी पूजी व् मानव का संघर्स सुरु नहीं हुआ है क्युकी मध्यम वर्ग दीवार बन कर खडा है .आज का विद्यार्थी व् नौजवान बेरोजगारी की आंधी में फसा हुआ है ,उसे बाहर निकलना ही होगा .गणेश बेरवाल .

Friday, March 25, 2016

होली

           होली
होली की  ढेरो सुभकामनाए मिली ,दोस्तों,रिश्तेदारों और परिचितों ने मुझे भी अपनी खुशी में सामिल किया ,मेरा भी फर्ज बनता है की उनका सुक्रिया अदा करू ,
   भारत को प्रक्रति की एक बहुत बड़ी देंन है की यहाँ पर सारे मोसम होते है मोसम का फसल चक्र और शारीरिक बदलाव से भी सम्बन्ध है सिंध से लेकर बिहार तक यह त्यौहार मनाया जाता है ,संचार के साधनों में परगति नहीं हुई थी उस समय तक इस त्यौहार की खुशी एक महीने तक मनाई जाती थी, ,विशेस तोर पर शेखावाटी जहा में रह्ता हु हर मौसम की राग और वाद्ययंत्र यंत्र भीं है ,जहा तक राग माला का सवाल है रामगढ शेखावाटी में रामगोपाल पोदार की छत्री पर बारह महीनो की रागनिया और वाद्ययंत्र भीती चित्रों में दर्शाए गए जो संगीत में इस इलाके की सम्रधता को दर्शाते है .
होली पर गिंदर और चंग का विशेस महत्व है यदि इनके साथ मजीरे और बांसुरी की धुन को मिला दिया जाये तब आदमी अपने आप थिरकने लग जाता है ,ग्रामवासी उच्चे टीले पर आग जलाकर आग की लपटों से हवा के रुख का अनुमान लगाते है, .साथ में अनाज भी लेजाते है तथा खलियान निकालने  की पर्था को भी निभाते है ,होलिका दहन के बाद वापिस आते समय औरते उन पर पानी छिड़कती है ,अनाज मिलाकर एक मिटी का पिंड बनाती है  जिससे अनुमान लगाया जाता है की अगली फसल केसी होगी ,वापिस गव के चोक में आकर होली के नारियल की chitkiya बाटी जाती है ,भोजन में केवल चावल सकर व् दाल  बनती है ,सुबह चंग के साथ मंडलीय निकलती है जो संपन लोगो  के यहाँ जाती है ,ज्यादातर शराब की बोतल मिलने पर आगे बढ़ जाती है ,रग लगाना आम बात है दलितों व् संपन घरो में सायंकाल मासहारी भोजन बनता है सायंकाल आखिरी गिदर और नगारे के डंके के साथ ही यह त्यौहार संपन मान् लिया  जाता है हालाकि कई जगह चंग की धमाल गनगोर  तक चलती है .
 संचार के साधनों के प्रवेस के साथ ही इस त्यौहार में भोडा पण भी आगया है ,स्वार्थी पंडितो ने इसमें एसी एसी कपोल कल्पित कहानी किस्से  जोड़ दिए और  इन किस्सों को जनता के जहनुम में बिठाने का पर्यास किया जा रहा  है ,आजकल टीवी और रेडिओ की हालत सरकारी भोपू से बढ़ कर नहीं है ,एक चेनल भखान कर रहा था की हिरण्यकस्यप  की राजधानी कहा थी ,प्रहलाद को किस पहाड़ से फेका गया व् होलिका प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर कहा दहन किया गया ढूडली गयी है .ये सब पेटू पंडितो के ठग कर खाने की कपोल गाथायें है इनमे नहीं पड़ कर होली आनन्द लीजिये मेरी सुभकामनाए आपके साथ है .गणेश बेरवाल


होली

           होली
होली की  ढेरो सुभकामनाए मिली ,दोस्तों,रिश्तेदारों और परिचितों ने मुझे भी अपनी खुशी में सामिल किया ,मेरा भी फर्ज बनता है की उनका सुक्रिया अदा करू ,
   भारत को प्रक्रति की एक बहुत बड़ी देंन है की यहाँ पर सारे मोसम होते है मोसम का फसल चक्र और शारीरिक बदलाव से भी सम्बन्ध है सिंध से लेकर बिहार तक यह त्यौहार मनाया जाता है ,संचार के साधनों में परगति नहीं हुई थी उस समय तक इस त्यौहार की खुशी एक महीने तक मनाई जाती थी, ,विशेस तोर पर शेखावाटी जहा में रह्ता हु हर मौसम की राग और वाद्ययंत्र यंत्र भीं है ,जहा तक राग माला का सवाल है रामगढ शेखावाटी में रामगोपाल पोदार की छत्री पर बारह महीनो की रागनिया और वाद्ययंत्र भीती चित्रों में दर्शाए गए जो संगीत में इस इलाके की सम्रधता को दर्शाते है .
होली पर गिंदर और चंग का विशेस महत्व है यदि इनके साथ मजीरे और बांसुरी की धुन को मिला दिया जाये तब आदमी अपने आप थिरकने लग जाता है ,ग्रामवासी उच्चे टीले पर आग जलाकर आग की लपटों से हवा के रुख का अनुमान लगाते है, .साथ में अनाज भी लेजाते है तथा खलियान निकालने  की पर्था को भी निभाते है ,होलिका दहन के बाद वापिस आते समय औरते उन पर पानी छिड़कती है ,अनाज मिलाकर एक मिटी का पिंड बनाती है  जिससे अनुमान लगाया जाता है की अगली फसल केसी होगी ,वापिस गव के चोक में आकर होली के नारियल की chitkiya बाटी जाती है ,भोजन में केवल चावल सकर व् दाल  बनती है ,सुबह चंग के साथ मंडलीय निकलती है जो संपन लोगो  के यहाँ जाती है ,ज्यादातर शराब की बोतल मिलने पर आगे बढ़ जाती है ,रग लगाना आम बात है दलितों व् संपन घरो में सायंकाल मासहारी भोजन बनता है सायंकाल आखिरी गिदर और नगारे के डंके के साथ ही यह त्यौहार संपन मान् लिया  जाता है हालाकि कई जगह चंग की धमाल गनगोर  तक चलती है .
 संचार के साधनों के प्रवेस के साथ ही इस त्यौहार में भोडा पण भी आगया है ,स्वार्थी पंडितो ने इसमें एसी एसी कपोल कल्पित कहानी किस्से  जोड़ दिए और  इन किस्सों को जनता के जहनुम में बिठाने का पर्यास किया जा रहा  है ,आजकल टीवी और रेडिओ की हालत सरकारी भोपू से बढ़ कर नहीं है ,एक चेनल भखान कर रहा था की हिरण्यकस्यप  की राजधानी कहा थी ,प्रहलाद को किस पहाड़ से फेका गया व् होलिका प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर कहा दहन किया गया ढूडली गयी है .ये सब पेटू पंडितो के ठग कर खाने की कपोल गाथायें है इनमे नहीं पड़ कर होली आनन्द लीजिये मेरी सुभकामनाए आपके साथ है .गणेश बेरवाल


होली

           होली
होली की  ढेरो सुभकामनाए मिली ,दोस्तों,रिश्तेदारों और परिचितों ने मुझे भी अपनी खुशी में सामिल किया ,मेरा भी फर्ज बनता है की उनका सुक्रिया अदा करू ,
   भारत को प्रक्रति की एक बहुत बड़ी देंन है की यहाँ पर सारे मोसम होते है मोसम का फसल चक्र और शारीरिक बदलाव से भी सम्बन्ध है सिंध से लेकर बिहार तक यह त्यौहार मनाया जाता है ,संचार के साधनों में परगति नहीं हुई थी उस समय तक इस त्यौहार की खुशी एक महीने तक मनाई जाती थी, ,विशेस तोर पर शेखावाटी जहा में रह्ता हु हर मौसम की राग और वाद्ययंत्र यंत्र भीं है ,जहा तक राग माला का सवाल है रामगढ शेखावाटी में रामगोपाल पोदार की छत्री पर बारह महीनो की रागनिया और वाद्ययंत्र भीती चित्रों में दर्शाए गए जो संगीत में इस इलाके की सम्रधता को दर्शाते है .
होली पर गिंदर और चंग का विशेस महत्व है यदि इनके साथ मजीरे और बांसुरी की धुन को मिला दिया जाये तब आदमी अपने आप थिरकने लग जाता है ,ग्रामवासी उच्चे टीले पर आग जलाकर आग की लपटों से हवा के रुख का अनुमान लगाते है, .साथ में अनाज भी लेजाते है तथा खलियान निकालने  की पर्था को भी निभाते है ,होलिका दहन के बाद वापिस आते समय औरते उन पर पानी छिड़कती है ,अनाज मिलाकर एक मिटी का पिंड बनाती है  जिससे अनुमान लगाया जाता है की अगली फसल केसी होगी ,वापिस गव के चोक में आकर होली के नारियल की chitkiya बाटी जाती है ,भोजन में केवल चावल सकर व् दाल  बनती है ,सुबह चंग के साथ मंडलीय निकलती है जो संपन लोगो  के यहाँ जाती है ,ज्यादातर शराब की बोतल मिलने पर आगे बढ़ जाती है ,रग लगाना आम बात है दलितों व् संपन घरो में सायंकाल मासहारी भोजन बनता है सायंकाल आखिरी गिदर और नगारे के डंके के साथ ही यह त्यौहार संपन मान् लिया  जाता है हालाकि कई जगह चंग की धमाल गनगोर  तक चलती है .
 संचार के साधनों के प्रवेस के साथ ही इस त्यौहार में भोडा पण भी आगया है ,स्वार्थी पंडितो ने इसमें एसी एसी कपोल कल्पित कहानी किस्से  जोड़ दिए और  इन किस्सों को जनता के जहनुम में बिठाने का पर्यास किया जा रहा  है ,आजकल टीवी और रेडिओ की हालत सरकारी भोपू से बढ़ कर नहीं है ,एक चेनल भखान कर रहा था की हिरण्यकस्यप  की राजधानी कहा थी ,प्रहलाद को किस पहाड़ से फेका गया व् होलिका प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर कहा दहन किया गया ढूडली गयी है .ये सब पेटू पंडितो के ठग कर खाने की कपोल गाथायें है इनमे नहीं पड़ कर होली आनन्द लीजिये मेरी सुभकामनाए आपके साथ है .गणेश बेरवाल


Thursday, November 12, 2015

 नरेंद्र  मोदी का इंग्लेंड दोरा
12नवम्बर को भारत के प्रधान  मंत्री इंग्लेंड के दौर पर गए ,पहले वहा के मंत्रियो,उच्च अधिकारियो एवं पूजी पतियों से बातचीत की .मोदी व् केमरोंन ने साझा प्रेस कोंफ्रेंस की और यह संदेस दिया की अब भारत का आगे का विकास इंग्लेड करेगा ,मोदी ने वहा की संसद को भी सम्बोधित  किया , जो देखने व् सुनने को मिला वह यह की हमें इंग्लेड का बड़ा आभारी रहना चाहिए की आज तक  यहाँ पहुचे है वह इंग्लेड की  ही देन है .जिन क्षेत्रो में समझोते किये  गए है ,किसी रास्त्र होने के नाते उनका क्या महत्व है ,क्या वे सवेदन सिल है जेसे रक्षा ,दूर संचार ,विधुत ,रेलवे हवाई यात्रा .
उत्पादन दो तरह का है ,क्रषि और उधोग ,भारत की क्रषि पिछली सरकारों द्वारा जान बुझ  कर पिछड़ा रखी  गई कभी यह भी नही सोचा गया की यह पैदावार ही नहीं करती है बल्कि ज्यादातर देस की जनता को रोजगार  भी मुहया  कराती है .,सरकारों की निति रहि है की किसान को इतना ही देवो की  वह ज़िंदा रहे ,और उसकी ओलादों को सरकारे अपनी रक्सा  के लिए काम में लेती रहे ,अन्यथा वह ताकत वर बन गया तब विद्रोह कर देगा ,उन्ही वर्ग के कुछ को खरीद कर पूंजी का गुलाम और दलाल बना लिया जाए .दुसरा उत्पादन उद्योगों का है  उद्योग भी दो तरह के है एक उपभोग सामग्री बनाने वाले ,दुसरे उपभोग सामग्री के लिए कच्चा माल तेयार करने वाले,आज भारत में तमाम उपभोग सामग्री विदेसी ही बनाते है सुबह के टूथ बुरस से लेकर रात्री के गुड नाईट तक ,
ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत को तलास करती हुई हथियारों की सोदागर बनकर आई थी और दोसो(२००) वर्ष तक लुटा ,अब मोदीजी फिर उनको बुलाने के लिए रेड कारपेट बिछा रहे है यह सोचनीय विषय है .टर्की जिसके घोड़ो की टापों  के निसान अब भी भारत की सर जमी पर है ,

fdi के नाम से विदेसियो को यह छुट देना की तुम हमारी जमिन खरीद सकते हो .प्राक्रतिक साधनों का दोहन कर सकते हो ,चाहे जितना मुनाफ़ा कमा सकते हो और अब तो तुम्हारे कारखाने के माल बेचने की लिए खुदरा दूकान भी खोल सकते हो ,वाह रे मेरे भारत तुम्हारे शरीर पर जख्म तुम्हारी यह नापाक फिकाप्र्स्त ही देगे और धब्बे  कही खून से ना धोने पड़े , मोदी भारत के वे चन्द लोग जो पेसे के लालच में विदेस में  बस गए व् विदेसियो के भरोसे   देस को नहीं चला सकते  ,मोदी को चाहिए की वह विदेस में ही बस जाए तो ज्यादा अछा रहेगा .—गणेश बेरवाल  

Tuesday, November 10, 2015

                                  दीपावली
       आज दीपावली है इस पर मेरे बहुत से दोस्तों और साथियो ने शुभकामनाय दी है कइयो ने फोन पर भी बात की जेसे हमारे सामने बधाई देने के अलावा कोई काम बचा ही नही है .सुभकामना देने से पहले आपको यह सोचना आवश्यक है की क्या तुम्हारी तरह मेरे घर पर भी वही खुसी का माहोल है या नहीं.फिर भी सुभकामनाए तो स्वीकार करनी ही पड़ेगी .
 हम लोग सिर्फ लीक पीटना जानते है या नकलची है ,हम किसी चीज की खोज खबर करते ही नहीं ,हमें यह पता ही नहीं है की दीपावली क्यों मनाई जाती है ,बच्चो को पढाया जाता है की इस दिन राम रावण को मार कर अयोद्या आये थे उस खुसी में दीपावली मनाई जाती है लेकिन घरो में जब पूजा होती है उसमे सिर्फ गणेस,लक्ष्मी व् सरस्वती का पाठा ही की पूजा की जाती है ,राम और हनुमान दोनों गायब है ,धर्म हमेसा ही लोगो को मानसिक गुलाम बनाने का काम करता है चाहे कोई सा भी हो ,
दीपावली क्यों मनाई जाती है इसकी गहराई में जाए तब सामने आता है की आदमी पशुपालन युग में जानवर की दावत करता था ,क्रषि अवस्था में फसल पक  कर खलियान निकाल कर किसान अनाज घर लाता तो वह खुसी मनाता ,अगली अवस्था में यह त्यौहार ठगों व् ब्यापारियो(ब्यापारी वह जो स्वयम कोई उत्पादन नहीं कर दुसरे की पैदावार की सिर्फ दलाली करता है )  से उनसे छीन  लिया ,इस त्यौहार को बढ़ा कर पाच दिन कर दिया और पुक्ता व्यवस्था कर दी की किसान को मुर्ख बनाकर केसे उसकी फसल को बाजार में मगाया जा सके.पहले दिन तेरस को पुराण यह आख्यान देते है की इस दिन समुद्र मंथन में धन्वन्तरी वेद्य निकले थे इस लिए यह उनके नाम से धन तेरस कहलाती है ,व्यापारियों ने डाकोतो(ज्योतिसियो)को लालच देकर मीडिया रूपी भाँड़ो द्वारा परचारित करवाया गया की इस दिन की खरीददारी  अति शुभ रहेगी ,पुलिश प्रसासन ऐसे तो रोड पर चालान करता है ,इन पाच दिनों में इन दलालों की जी भर कर सेवा करता है ,यदि तेरस को कोई खरीद दारी से वंचित  रह जाता है वह कांति दिवाली को पूरी कर  सकता है ,फर्क इतना ही है की गन्ने का एक डंठल किसान से पचीस या पचास पेसे में खरीदता है वह व्यापारी पचास रूपये तक बेचता है क्योकि  डाकोतो ने बता दिया की इससे लक्ष्मी राजी होती है .एक तरफ सरकार पर्यवरण बचाने के नाम पर करोडो खर्चती  है दीपावली के दिन सबसे ज्यादा पर्यावरण खराब किया  जाता है वाह मेर देस की जनता अपनी बर्बादी पर खुसी जाहिर करती है .

 पुराणों में दीपावली के बारे में जो लिखा है वह यदि में लिखू तब मेरे बहुत से दोस्त आग बबूला हो जाए गे इसलिए दोस्तों की खुसी में खलल नहीं डालना चाहता .दीपावली के  दुसरे दिन घरो के सामने गोबर इकठा कर उस पर दिया जलाते है तथा जो दियो में तेल बच जाता है उसे जानवरों के सिंग चोपड़े जाते है ,अगले दिन भेया दूज के रूप में यह त्यौहार सम्पूर्ण होता है कास्तगार एवं मजदूर  फिर खाली जेब उधार लेने के चक्र में घूमना  शुरु कर देता है ,इस मोके पर  लम्पट सर्वहारा भी जुआ,चोरी कर अपना शगुन मनाते है .आप से विनती है की स्वयम की बर्बादी पर खुसी मनाना बंद करदो तो अचा है अन्यथा आपकी मर्जी . 

Monday, October 12, 2015

अभिव्यक्ति पर हमले के खिलाफ साहित्यकारों की सुरुआत ====साहित्यकार समाज का दर्पण होता है ,उसकी जुमेदारी बनती है की वह आने वाले खतरे को भाप कर जनता को सावधान  करे व् जन आन्दोलन के लिए प्रेरित  भी करे .अन्यथा “कवी मार्टिन निमालकर (जर्मन कवी )ये पंक्तिया ही रह जायेगी .*पहले वे kamunisto(कमुनिस्ट ) को मारने आये ,
और में कुछ नहीं बोला
क्योकि मै  कमुनिस्ट नहीं था .
फिर वे कवियों और लेखको को मारने आये ,
और में कुछ नही बोला ,
क्योकि की में कोई कवि या लेखक नहीं था .
फिर वे यहूदियों को मारने आये ,और में कुछ नही बोला ,
क्योकि में यहूदी नहीं था .
फिर वे केथोलिको को मारने आये ,और मै कुछ नही बोला ,
क्योकि मै तो एक प्र्रोतैस्तैत था .
फिर वे मुझे मारने  आये ,
 और उस समय तक ऐसा कोई नहीं बचा था ,

जो मेरे पक्स में बोलता .===आपातकाल काल (१९७५ से १९७७ )की जेलों में ज्यार्जी दिमित्राफ को गभीरता से पढ़ा और उनकी यह पंक्तिया आज भी बराबर मन को कुरेदती है की “पूंजीवाद जनतंत्र के चोगे को तब तक ही धारण करता है जहा तक वह बोझ नहीं बनता अन्यथा इस लोकतंत्र रूपी चोगे को उतार कर कूड़े दान पर फेकने में कोई देर नहीं लगती है “तांडव न्रत्य होने वाला है .गणेश बेरवाल मिसा बंदी .